नन्हे हाथोंकी नन्ही लकीरें

नन्हे हाथोंकी नन्ही लकीरें
धुल रही हैं नसीब अपना
हमींसे है बर्बाद ये और
कहेते है भारत है कल का

मासूमियत फुलोंसी है
गालोंपे है हर दिल फ़िदा
चमकीं रहे किस्मत तेरी
जैसे जूता किसी गैर का

खिलता रहे नन्हा चमन
दुखका मिटे नामो निशान
आंखोंमें सजते ख्वाब हो
हाथोंमे लिए बेचे तिरंगा

फैलाते नन्हे हाथ भी
चाहे करे मजदुरियां
नौकर कोई रखता उन्हें
यहाँ जिस्मों के बाजारसा


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